लखनऊ खबर | Lucknow Khabar Special Report
लखनऊ / मैनपुरी: उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था से जुड़ा एक दिल झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जहां मैनपुरी निवासी आजाद खान ने अपनी जवानी के 24 साल जेल की सलाखों के पीछे गुजार दिए। डकैती के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे आजाद को हाई कोर्ट ने बेगुनाह करार दिया, लेकिन कागजी औपचारिकताओं और महज 7000 रुपये के जुर्माने के कारण उनकी रिहाई में कई दिन की देरी हो गई।
यह मामला न सिर्फ न्याय की जीत है, बल्कि सिस्टम की देरी और कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
⚖️ साल 2000 में गिरफ्तारी, 2025 में मिली राहत
मैनपुरी के रहने वाले आजाद खान को साल 2000 में डकैती के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। निचली अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुना दी। इसके बाद उनके भाई मस्तान खान ने मजदूरी कर-करके हाई कोर्ट में अपील की।
करीब ढाई दशक बाद Allahabad High Court के न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर ने 19 दिसंबर 2025 को आजाद खान को दोषमुक्त करार दिया। अदालत ने साफ कहा कि केवल इकबालिया बयान के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, और पुलिस आजाद के खिलाफ कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सकी।
📄 धारा 437A बनी आज़ादी में बाधा
हाई कोर्ट से बरी होने के बावजूद आजाद खान की रिहाई आसान नहीं रही। धारा 437A के तहत जमानतदार पेश करने और अन्य कानूनी औपचारिकताओं के चलते उनका रिलीज ऑर्डर जारी नहीं हो सका।
इसके अलावा, एक अन्य मामले में उन पर 7000 रुपये का जुर्माना बकाया था। यह रकम जमा न होने पर, बेगुनाह साबित होने के बाद भी उन्हें एक साल और जेल में रहना पड़ सकता था।
🚨 मीडिया की पड़ताल और समाजसेवियों की पहल
मामला सामने आने के बाद शासन से लेकर बरेली सेंट्रल जेल प्रशासन तक में हड़कंप मच गया। जेल सुपरिंटेंडेंट अविनाश गौतम ने तत्काल ईमेल के जरिए न्यायालय से संपर्क किया।
जब यह स्पष्ट हुआ कि आजाद खान के पास जुर्माने की रकम नहीं है, तब सामाजिक संस्था ‘छोटी सी आशा’ की पारुल मलिक और रूपाली गुप्ता ने आगे बढ़कर 7000 रुपये जमा किए। इसके बाद ही बरेली सेंट्रल जेल से आजाद को उनके भाई मस्तान के सुपुर्द किया गया।
👨👩👧 24 साल बाद घर वापसी, खुशी और दर्द दोनों
जब आजाद खान 24 साल बाद जेल से बाहर आए, तो परिवार की आंखों में खुशी के आंसू थे, लेकिन सिस्टम की देरी का दर्द भी साफ झलक रहा था। जेल प्रशासन ने रिहाई का वीडियो जारी कर इस पूरी प्रक्रिया के पूर्ण होने की पुष्टि की।
यह मामला एक बार फिर बताता है कि न्याय मिलने में देरी, अपने आप में सबसे बड़ा अन्याय है।
🔗 कानूनी जानकारी के लिए भरोसेमंद स्रोत
भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता और धारा 437A से जुड़ी आधिकारिक जानकारी भारत सरकार के विधि एवं न्याय मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है, जो एक विश्वसनीय और स्पैम-फ्री आउटबाउंड स्रोत माना जाता है।


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